Karma Yoga
कर्म योग
सारे कर्म सब प्रकार से प्रकृति के तीन गुणों— सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण—द्वारा {शरीर और मन के माध्यम से} किए जाते हैं। तो भी, जिसका अंतःकरण अहं-भाव से मोहित हो रहा है, वह अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’, ऐसा मानता है।
तत्त्व-वित् तु महा-बाहो गुण-कर्म-वि-भागयोः। गुणाः गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।।
तु (लेकिन) महा-बाहो (हे महान भुजाओं वाले, अर्जुन) गुण-कर्म-वि-भागयोः (गुण और कर्म के विभाजन के विषय में) तत्त्व-वित् (तत्व को जानने वाला) गुणाः (गुण) गुणेषु (गुणों में ही) वर्तन्ते (कार्य करते हैं) इति (ऐसा) मत्वा (सोचकर) न (नहीं) सज्जते (आसक्त होता है)।
Hindi
परंतु हे अर्जुन! प्रकृति के तीन गुणों और कर्मों के भेद के सत्य या असलियत को जानने वाला रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण, ये तीनों गुण ही इंद्रिय-तृप्ति या कर्म-तृप्ति में लगे हुए हैं, ऐसा मानकर {इंद्रिय-भोगों और कर्मों में} आसक्त नहीं होता।
English
But O, Mighty-armed! One who recognizes that all events stem from Nature's three primary forces (Gunas) sees life's events as a dance of these elements. By seeing things this way, one doesn't get overly attached to worldly matters. (3:28)
Hindi
मैं (आत्मा) तो ईश्वर का अंश हूँ, और उन्हीं की तरह सत्-चित्-आनंद हूँ, दुःखों से पूर्णतः परे हूँ! यह तो प्रकृति ने मेरे (आत्मा के) चारों ओर अपने तीन गुणों से जो मायावी आवरण बनाकर एक नकली ‘मैं’—एक छद्म-आत्मा (नकली आत्मा)—की रचना कर डाली है, वह नकली ‘मैं’ या त्रिगुणात्मक छद्म-आत्मा {जो मन-बुद्धि-अहंकार आदि से निर्मित है} ही इन गुणों से प्रेरित इंद्रिय-भोग-तृप्ति और विभिन्न कर्मों में लगी हुई है, ऐसा असलियत जानने वाले समझते हैं, इसलिए इंद्रिय-भोगों और कर्मों में आसक्त नहीं होते।