Sankhya Yoga
सांख्य योग
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।। 2:67॥
इन्द्रियाणाम् हि चरताम् यत् मनः अनु-वि-धीयते, तत् अस्य हरति प्रज्ञाम्, वायुः नावम् इव अम्भसि।
हि (क्योंकि) इव (जैसे) अम्भसि (जल में) नावम् (नाव को) वायुः (हवा) हरति (हर लेती है) चरताम् (विचरती हुई) इन्द्रियाणाम् (इन्द्रियों में से) मनः (मन) यत् (जिनके) अनु-वि-धीयते (पीछे चलता है), तत् (वह) अस्य (इसकी) प्रज्ञाम् (बुद्धि) (को हर लेती है) ।
Hindi
जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है—जबरन गलत दिशा में दूर बहा ले जाती है—वैसे ही विचरणशील इंद्रियों में से कोई भी, जिसके साथ मन लगा रहता है, मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है, अर्थात लक्ष्य से दूर बहा ले जाती है।
English
Just as strong winds can forcefully carry a boat in an unwanted direction on the waters, even one of the wayward sense organs, to which the mind is hooked, can hijack discriminative intelligence from its intended track. (2:67)