Moksha Sannyasa Yoga
मोक्ष संन्यास योग
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ 18:71॥
श्रद्धा-वान्, अन्-असूयः च, श्रृणुयात् अपि यः नरः, सः अपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्, पुण्य-कर्मणाम्।
यः (जो) नरः (मनुष्य) श्रद्धावान् (श्रद्धा-युक्त) च (और) अनसूयः (दोष-दृष्टि से रहित) श्रृणुयात् अपि (सुनता भी है), सः (वह) अपि (भी) मुक्तः (मुक्त हुआ) पुण्य-कर्मणाम् (पुण्य कर्म करने वालों में) शुभान् (शुभ) लोकान् (लोकों को) प्राप्नुयात् (प्राप्त करता है)।
Hindi
जो मनुष्य श्रद्धा-युक्त और द्वेष-रहित होकर {भगवद्-गीता को} सुनेगा वह भी {पापमय प्रवृत्तियों से} मुक्त होकर {मृत्यु के बाद} पुण्य-कर्म करने वालों के {स्वर्ग आदि} शुभ लोकों या पुण्य लोकों को प्राप्त करेगा।
English
Those who listen to the Bhagavad-Gitā with faith, devotion, and without ill intent will also be liberated and, upon death, attain the divine realms reserved for virtuous souls. (18: 71)
Hindi
भूर्लोक के ऊपर क्रमशः भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक या ब्रह्मलोक हैं, जिन्हें 'पुण्य लोक' कहा जाता है।