Moksha Sannyasa Yoga
मोक्ष संन्यास योग
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥ 18:37॥
यत् तत् अग्रे विषम्-इव, परिणामे अमृत उपमम्— तत् सुखम् 'सात्त्विकम्' प्रोक्तम्, आत्म-बुद्धि प्रसाद-जम्।
यत् (जो ऐसा सुख है) तत् (वह) अग्रे (शुरू में) विषम्-इव (विष के समान), परिणामे (परिणाम में) अमृत-उपमम् (अमृत के समान), तत् (वह) आत्म-बुद्धि (आत्म-बोध के) प्रसाद-जम् (प्रसाद से उत्पन्न) सुखम् (सुख) 'सात्त्विकम्' (सात्विक) प्रोक्तम् (कहा गया है)।
Hindi
जो शुरू में तो विष के बराबर जान पड़ता है, परंतु परिणाम में अमृत के समान है, जो आत्मनिष्ठ बुद्धि की प्रसन्नता से प्राप्त होता है, उस सुख को सात्त्विक सुख कहते हैं।
English
At first, that {happiness from the Noble Mode} may seem like poison, but it ultimately becomes as sweet as an elixir. This joy arises from a serene and tranquil state of mind achieved through Self-realization. (18:37)
Hindi
आत्म-बोध (यह ज्ञान कि मैं ईश्वर का ही अंश हूँ) या ईश्वर-प्राप्ति से मिलने वाले सुख के रास्ते सामान्य लोगों को कठिन और कष्टकर लगते हैं — स्वयं को भी, और सांसारिकता में रमे हुए सगे-संबंधियों को भी। जैसे मिठाई मुँह में डालते ही बिना किसी पूर्व अभ्यास के तत्काल आनंद देती है, वैसा आत्म-बोध या ईश्वर-प्राप्ति के साथ नहीं होता। इसकी साधना में अभ्यास लगता है, समय लगता है, जो शुरू में काफी कष्टकर लग सकता है। उदाहरण के लिए, ध्यान-मार्ग में अभ्यास के माध्यम से लंबे समय तक शरीर को एक ही आसन में बैठकर ध्यान करने के लिए तैयार करना होता है — जो एक कष्टकारी प्रक्रिया है। ज्ञानमार्गी भी लंबे समय तक भोग-विलास से अलग रहकर ब्रह्मचर्य-व्रत के साथ अध्ययन, मनन, निदिध्यासन आदि के द्वारा आत्म-ज्ञान या ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति का प्रयास और अभ्यास करते हैं। कर्म-योग में इतना कष्ट नहीं होता, क्योंकि इसमें इंद्रिय-भोगों को त्यागने की जरूरत नहीं पड़ती — सिर्फ उनमें अनासक्ति विकसित करनी पड़ती है। मगर वह भी मिठाई की तरह तत्काल सुखदायी नहीं है। उसमें भी अनासक्ति विकसित करने और सीखने में लंबा समय और अभ्यास लगता है। नियमों और विधि-विधानों से हटकर जो प्रेमा-भक्ति होती है, वह एक ऐसा मार्ग है जिसमें तत्काल उच्च कोटि का सात्त्विक आनंद मिलता है — जिसके सामने मिठाई की मिठास भी फीकी पड़ जाती है, और भोग-विलास तुच्छ लगने लगते हैं। भक्ति-मार्ग में शुरू से ही एक सात्त्विक व्यक्ति को परम आनंद की अनुभूति होती है। लेकिन इस सतत सुख को प्राप्त करने के लिए भी थोड़ा समय तो लगता ही है। जो लोग भावना-प्रधान नहीं होते और भक्ति-मार्ग अपनाते हैं, वे वैधी (विधि-विधान वाली) भक्ति की ओर चले जाते हैं, जिसमें अनेक शास्त्रीय नियमों-कानूनों के पालन के द्वारा ईश्वर के किसी सगुण-साकार रूप की भक्ति की जाती है। इन नियमों का पालन शुरू में कष्टकारक लग सकता है, और उन नियमों के पालन का सतत अभ्यास भी करना पड़ता है। लेकिन इन सभी कष्टकर साधनों और अभ्यास से अंत में जो अमृतत्व और ईश्वर-प्राप्ति-रूप परम और अक्षय आनंद प्राप्त होता है — उसके सामने सारे सांसारिक आनंद अत्यंत तुच्छ हैं। उपर्युक्त श्लोक में भगवान का यही अभिप्राय है।
English
The journey towards Self-realization, which involves realizing one’s essential connection with God, may appear challenging and even uncomfortable to ordinary individuals and those deeply engrossed in worldly pursuits. Worldly pleasures may provide instant gratification, unlike the path of Self- or God-realization, which can require years of dedication. This might entail postponing some or all worldly pleasures for an extended period. However, when true knowledge and supreme bliss emerge, worldly pleasures lose their significance, much like the radiant moon fading away with the rising sun. In this book, ten paths to God and Nirvāna, as outlined in the Holy Gitā, are briefly presented in "The Final Revelation" section toward the end of the book. It’s important to note that not all paths are equally suitable for everyone, and not all of them are necessarily strenuous or painful, but they do require some practice and time. Ultimately, however, all these paths lead to Immortality, supreme bliss, and beatitude. This is the essence of the message conveyed by these two verses.