Gunatraya Vibhaga Yoga
गुणत्रय विभाग योग
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ 14:20॥
गुणान् एतान् अतीत्य त्रीन् देही देह-सम्-उद्भवान्, जन्म-मृत्यु-जरा-दुःखैः वि-मुक्तः अ-मृतम् अश्नुते।
देही (देहधारी) देह-सम्-उद्भवान् (देह से उत्पन्न होने वाले) एतान् (इन) त्रीन् (तीन) गुणान् (गुणों को) अतीत्य (पार कर) जन्म-मृत्यु-जरा-दुःखैः (जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और दुःखों से), वि-मुक्तः (मुक्त हुआ) अ-मृतम् (अमृत को) अश्नुते (प्राप्त करता है)।
Hindi
देह में स्थित जीवात्मा शरीर की रचना करने वाले {प्रकृति के} इन तीनों गुणों को लाँघ जाने से जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुई अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त करती है।
English
The living being attains Immortality—liberated from birth, death, old age—and freedom from all sorrows, by transcending the three Modes of Nature that constitute the body. (14:20)