Gunatraya Vibhaga Yoga
गुणत्रय विभाग योग
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥ 14:19॥
न अन्यम् गुणेभ्यः कर्तारम् यदा द्रष्टा अनुपश्यति, गुणेभ्यः च परम् वेत्ति, मत्-भावम् सः अधि-गच्छति ।।
यदा (जब) द्रष्टा (देखने वाला) गुणेभ्यः (गुणों से) अन्यम् (अन्य को) कर्तारम् (कर्ता) न (नहीं) अनुपश्यति (देखता) च (और) गुणेभ्यः (गुणों से) परम् (जो परे है उसे) वेत्ति (जानता है), सः (वह) मत्-भावम् (मेरे स्वभाव को) अधि-गच्छति (प्राप्त करता है)।
Hindi
जिस समय द्रष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को—स्वयं को भी—कर्ता नहीं देखता, और मुझे तीनों गुणों से अत्यंत परे जान लेता है, {उस समय} वह मेरे भाव (निष्त्रैगुण्य भाव, गुणातीत अवस्था) को प्राप्त हो जाता है।
English
At the time when the seer does not perceive anyone other than the three Modes of Nature as agent or doer {not even themselves} and knows Me to be beyond the three Modes of Nature, {at that time} they attain union with My Divine Essence. (14:19)