Gunatraya Vibhaga Yoga
गुणत्रय विभाग योग
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥ 14:12॥
लोभः, प्रवृत्तिः, आरम्भः कर्मणाम्, अशमः, स्पृहा— रजसि एतानि जायन्ते वि-वृद्धे, भरत-ॠषभ!
भरत-ॠषभ (हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ)! रजसि (रजस के) वि-वृद्धे (की वृद्धि होने पर) लोभः (लोभ), प्रवृत्तिः (प्रवृत्ति), कर्मणाम् (कर्मों का) आरम्भः (आरम्भ), अशमः (अशांति), स्पृहा (स्पृहा), एतानि (ये सब) जायन्ते (उत्पन्न होते हैं)।
Hindi
हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, {सांसारिक कार्यों में} प्रवृत्ति, कर्मों का {सकाम-भाव से} आरंभ, इच्छा—ये सब उत्पन्न होते हैं।
English
On the dominance of the Passional Mode of Nature (RajoGuna), traits such as avarice, a heightened inclination toward action, restlessness of the mind, and desires arise, O Best of the Descendants of King Bharata. (14:12)