Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥ 13:32॥
यथा सर्व-गतम् सौक्ष्म्यात् आकाशम् न उप-लिप्यते, सर्वत्र अव-स्थितः देहे तथा आत्मा न उप-लिप्यते।
यथा (जैसे) सर्व-गतम् (सर्वत्र व्याप्त) आकाशम् (आकाश) सौक्ष्म्यात् (सूक्ष्म होने के कारण) न (नहीं) उप-लिप्यते (लिप्त होता है) तथा (वैसे ही) देहे (शरीर में) सर्वत्र (सर्वत्र) अवस्थितः (स्थित) आत्मा (आत्मा) न (नहीं) उप-लिप्यते (लिप्त होता है)।
Hindi
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण किसी चीज में लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा {निर्गुण होने के कारण} देह {के गुणों} से वास्तव में लिप्त नहीं होती।
English
Just as the all-encompassing sky, being subtle, does not get tainted {by the objects it encompasses}, the {One) Self that is present in everybody, remains unblemished by kārmic impurities. (13:32)