Vishwarupa Darshana Yoga
विश्वरूप दर्शन योग
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ 11:45॥
अदृष्ट-पूर्वम् हृषितः अस्मि दृष्ट्वा, भयेन च प्रव्यथितम् मनः मे; तत्-एव मे दर्शय देव-रूपम्, प्रसीद देव-ईश जगत्-निवास!
अदृष्ट-पूर्वम् (जिसे पहले कभी नहीं देखा) दृष्ट्वा (देखकर) हृषितः (आनंदित) अस्मि (हूँ) च (और) मे (मेरा) मनः (मन) भयेन (भय से)प्रव्यथितम् (व्यथित हो रहा है); तत् (वह), देव-रूपम् (देव-रूप) एव (ही) मे (मुझे) दर्शय (दिखाइए)! देव-ईश (हे देवेश)! जगत्-निवास (हे जगत के निवास), प्रसीद (प्रसन्न हों)!
Hindi
पहले न देखे हुए आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित भी हो रहा हूँ और मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप अपने उस {चतुर्भुज} देव-रूप के ही दर्शन मुझे दीजिए! हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए!
English
O, God! I am ecstatic about beholding something never seen before, yet my heart is fraught with fears. {Therefore, to bring peace to my shaken heart} show me your previous {benign} Deity-form. Be gracious, O, God of gods and Refuge of the Universe! (11:45)
Hindi
False