अंतःकरण को शुद्ध किए बिना ऊँची आध्यात्मिक उपलब्धि और ईश्वर दर्शन असंभव है।
भगवद् गीता में कहा गया है कि मन के विकार — काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य — ये सभी आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हैं।
इन विकारों को दूर करने के लिए आत्म-निरीक्षण, ध्यान, और सत्संग आवश्यक है। जब हम अपने मन को शुद्ध करते हैं, तब ईश्वर दर्शन संभव होता है।
