Atma Samyama Yoga
आत्म संयम योग
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥ 6:4॥
यदा हि न इन्द्रिय-अर्थेषु, न कर्मसु अनु-षज्जते, सर्व-सङ्कल्प-सन्न्यासी, योग-आरूढः तदा उच्यते।
यदा (जब) न (न) इन्द्रिय-अर्थेषु (इन्द्रिय के भोगों में) न (न ही) कर्मसु (कर्मों में) हि (ही) अनु-षज्जते (आसक्त होता है) तदा (तब) सर्व-सङ्कल्प-सन्न्यासी (सभी संकल्पों से संन्यास ले लेने वाला व्यक्ति) योग-आरूढः (योग में अच्छे प्रकार से स्थित) उच्यते (कहा जाता है)।
Hindi
जिस काल में वह न तो इंद्रियों के भोगों में और न कामना-पूर्ति वाले कर्मों में ही आकर्षित-आसक्त होता है, उस काल में लौकिक कामना-तृप्ति के सभी संकल्पों-भावों का त्यागी मुनि योगारूढ़ या योग में अच्छे प्रकार से स्थिर कहा जाता है।
English
One is said to have firmly stabilized in the {Meditative} Yoga {experiencing the union of the soul with the Supreme Spirit God} when he is not drawn anymore to hedonistic pleasures and worldly acts and has forsaken all temporal resolves. (6:4)