Atma Samyama Yoga
आत्म संयम योग
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ 6:30॥
यः माम् पश्यति सर्वत्र, सर्वम् च मयि पश्यति, तस्य अहम् न प्र-णश्यामि, सः च मे न प्र-णश्यति।
यः (जो) सर्वत्र (हर जगह) माम् (मुझे) पश्यति (देखता है) च (और) सर्वम् (सभी चीजों को) मयि (मुझमें) पश्यति (देखता है) तस्य (उसके लिए) अहम् (मैं) न प्र-णश्यामि (अदृश्य नहीं होता) च (और) सः (वह)मे (मेरे लिए) न प्र-णश्यति (अदृश्य नहीं होता)।
Hindi
जो सब-कुछ में मुझ ईश्वर को देखता है और सभी-कुछ को मुझमें देखता है, उसकी आँखों से मैं कभी ओझल नहीं होता और वह भी मेरे लिए कभी लुप्त नहीं होता, अर्थात वह सदा {विशेष रूप से} मेरी दृष्टि में बना रहता है।
English
{Thus, having discovered the Oneness of his soul and the souls of all others with the Supreme Soul, God} One starts perceiving Me in everything and everything in Me. Such a Yogi never loses sight of Me, and I never let him slip out of my heart. (6:30)
Hindi
"यो मां पश्यति सर्वत्र" के संदर्भ में मानस का यह कथन द्रष्टव्य है— "सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।" (मानस, बा. 7 घ) महान संत एकनाथ के जीवन का एक प्रसंग इस सिद्धांत को बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत करता है। एक बार संत एकनाथ प्रयागराज से गंगा का जल काँवर में लेकर कुछ साधुओं के साथ रामेश्वरम भगवान शिव का जलाभिषेक करने पैदल निकल पड़े। रास्ते में एक रेगिस्तान-जैसा सूखा क्षेत्र आया, जहाँ एक गधा गरमी और प्यास से तड़प रहा था। साधुओं की आँखों में करुणा उमड़ पड़ी, मगर आस-पास जल का स्रोत न होने से वे कुछ कर नहीं पाए और आगे बढ़ गए। मगर संत एकनाथ तो इस श्लोक के अनुकूल सभी में अपने प्रभु को ही देखते थे। इसलिए वे रुके और उन्होंने भगवान शिव के लिए ले जाया जा रहा गंगाजल गधे के मुख में उड़ेलकर उसे तृप्ति प्रदान की और उसका जीवन बचाया। फिर जब वे सभी साधुओं के संग रामेश्वरम मंदिर में पहुँचे तो अन्य साधु तो शिवलिंग को जल अर्पण करने आगे बढ़ गए, मगर संत एकनाथजी मंदिर में पीछे की ओर चुपचाप खड़े हो गए। कहते हैं कि उसी समय शिवलिंग के पास से आकाशवाणी हुई—"एकनाथ, आपका अर्पित किया हुआ जल मुझे मिल गया है, आप आगे आएँ, मैं आपके दर्शन करना चाहता हूँ..."। "यो मां पश्यति सर्वत्र" के संदर्भ में भागवतपुराण का यह प्रसंग भी देखना चाहिए : इस प्रसंग में श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि कैसे प्रत्येक प्राणी में अपने इष्टदेव को 'देखा' जाए— "सभी प्राणियों में क्षेत्रज्ञ रूप से समानता के व्यवहार से मेरी आराधना करे। इन सभी स्थानों में इस प्रकार शंख-चक्र-गदा-पद्म युक्त चतुर्भुज शांत रूप का ध्यान करते हुए एकाग्र होकर मेरा पूजन करे।" (श्लोक 45, 46, अध्याय 11, एकादश स्कंध, भा. पु.) उपर्युक्त कथन, जो भगवद् गीता के श्लोक का ही अनुसरण करता है, को आधार बनाकर एक 'नारायण ध्यान' की प्रक्रिया होती है, जिसमें आँखें बंद कर एक-एक कर सभी जीवों को ध्यान में देखा जाता है और उनमें भगवान के चतुर्भुज रूप की धारणा की जाती है, ताकि उन सभी में हम आँखें खोलकर भी ईश्वर का ही दर्शन कर सकें। नारायण ध्यान में पिता, माता, मित्र आदि के अतिरिक्त ऐसे लोगों को भी देखना चाहिए, जिनके प्रति हमारा कोई विशेष आदरभाव या प्रेमभाव नहीं है, या शत्रुता है, या जिनसे हम द्वेष करते हैं—उदाहरण के लिए हमारे चाकर, गृह-सहायिका (मेड), भंगी, सफाई कर्मचारी, ड्राइवर, रिक्शेवाले, शत्रु, कुत्ते, गायें, आदि। उपर्युक्त ध्यान करने से हमारा व्यवहार सभी के प्रति आदरपूर्ण और संवेदनशील होने लगता है। आवश्यक बाहरी औपचारिकता निभाने के बावजूद हम उनसे मधुर वाणी में बातें करने लगते हैं, उन्हें खाने-पीने के लिए पूछने लगते हैं, उन्हें उचित आसन देकर बिठाते हैं, सदा खड़े नहीं रखते। जानवरों से अच्छा व्यवहार करते हैं, पंछियों को दाने-पानी देने लगते हैं, आवारा कुत्तों को भी कुछ प्यार से खिलाने-पिलाने लगते हैं। उन्हें अनावश्यक पत्थर मारकर भगाते नहीं। गोशाला जाकर गायों को बीच-बीच में उनमें चतुर्भुज रूप के दर्शन करते हुए खिलाने भी लगते हैं। क्रमशः हम पाते हैं कि ऐसा नारायण ध्यान रोज़ पाँच-दस मिनट करने से हमारी भाव-संशुद्धि और सत्व-संशुद्धि होने लगती है और हम स्वयं नारायण रूप के दर्शन की पात्रता विकसित कर लेते हैं। फिर कभी भी हमें भगवान अपने चतुर्भुज रूप में साक्षात दर्शन दे सकते हैं।
English
The practical application of this verse is evident in the Bhāgawata Purāna, where Bhagawān Krishna explains how to see one's favorite Personified God in every living being: "Worship Me, who dwells in every living being as their soul, with equally good behavior toward them all. In all of them, visualize My four-armed serene, and calm form with a conch shell (shankha), Sudarshan Chakra (a weapon with the shape of a revolving disc), and lotus flower." (Verse 45, 46, Ch. 11, Eleventh Skandha, Bhāgawata Purāna).