Karma Sannyasa Yoga
कर्म संन्यास योग
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ 5:18॥
विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे, गवि, हस्तिनि, शुनि च एव, श्वपाके च, पण्डिताः सम-दर्शिनः।
पण्डिताः (ज्ञानी लोग) विद्या-विनय-सम्पन्ने (विद्या और विनय से सम्पन्न) ब्राह्मणे (ब्राह्मण में) च (और) गवि (गाय में) हस्तिनि (हाथी में) शुनि (कुत्ते में) च (और) श्वपाके (श्वपाक या चंडाल में) सम-दर्शिनः एव (समान दृष्टि ही रखते हैं)।
Hindi
ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में और गौ, हाथी, कुत्ते और श्वपाक (शूद्र) में भी समदर्शी होते हैं।
English
Those blessed with spiritual wisdom view equally a learned and polite Brāhmin, a Shvapāka, an elephant, a cow, and a dog. (5:18)
Hindi
मनुस्मृति 10:19 के अनुसार 'क्षत्ता' जाति के पुरुष द्वारा 'उग्र' नामक कन्या से उत्पन्न किया गया पुत्र 'श्वपाक' कहलाता है। मनुस्मृति 10:12 के अनुसार प्रतिलोम क्रम से शूद्र द्वारा क्षत्रिय वर्ण की स्त्री से उत्पन्न पुत्र 'क्षत्ता' कहलाता है, जिसे मनु 10:16 के अनुसार शूद्र से भी नीच माना गया है। क्षत्रिय पिता और शूद्र माता से उत्पन्न संतान मनु 10:9 के अनुसार 'उग्र' कहलाती है। इस प्रकार 'श्वपाक' मनुवादी या जातिवादी वर्ण-व्यवस्था में {शूद्रों में भी} सबसे नीच और 'विनययुक्त ब्राह्मण' {ब्राह्मणों में भी} सबसे उच्च माना जाता है। भगवद् गीता का स्वर तथाकथित 'नीच' जातियों के विषय में सामान्य हिंदू-परंपरा से बिलकुल अलग है। उन्हें समता का स्थान देने का उद्यम भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पूर्वावतार श्रीराम-रूप में भी किया था। जंगल जाते वक्त रास्ते में जब निषादराज से श्रीराम की मुलाकात होती है तो वे उन्हें बाँहों में भरकर गले लगा लेते हैं—"कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।" (अयोध्याकांड, 195:4)। तुलसीदास यह बताना नहीं भूलते कि उस समय निषाद जाति लोक और वेद दोनों के अनुसार ऐसी 'नीच' मानी जाती थी कि उसकी छाया पड़ जाने से भी स्नान करना होता था—"लोक बेद सब भाँतिहि नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।" (अयोध्याकांड, 193:2)। श्रीरामचरितमानस के नायक स्वयं श्रीराम हैं। अतः शूद्रों या तथाकथित 'नीची' जातियों के प्रति उनका जो व्यवहार और दृष्टिकोण है, वही तुलसीदास और मानस का भी दृष्टिकोण माना जाना चाहिए। इसलिए भगवान राम के मुख से उच्चरित बताया गया यह ब्राह्मणवादी और शूद्र-विरोधी कथन निःसंदेह एक प्रक्षिप्त अंश प्रतीत होता है—एक ऐसा वाक्य जो श्रीराम के चरित्र के अनुरूप नहीं, किंतु वैदिक और पौराणिक धर्मधाराओं की पारंपरिक आस्था को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करता है : "पूजिए बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।" —श्रीरामचरितमानस,अरण्यकांड, 33.1 इसके विपरीत, भगवद् गीता का दृष्टिकोण वैदिक और पौराणिक धर्म-परंपराओं से सर्वथा भिन्न है। इस प्रकार के ब्राह्मणवादी कथन गीता में कहीं नहीं मिलते। वह जाति (जन्म) की बजाय गुण और कर्म को प्राथमिकता देती है और किसी के भी प्रति नीच भाव नहीं रखती—और यह केवल श्लोक 5:18 में ही नहीं, अपितु गीता के अनेक श्लोकों में स्पष्ट रूप से प्रतिलक्षित होता है। गीता एक समतावादी ग्रंथ है। इस श्लोक में हिंदुओं की एक और प्रथा पर भगवान ने निशाना साधा है। हिंदू गाय को तो माता बनाकर उन्हें पूजते हैं और गो-रक्षा के लिए विशेष प्रयत्नशील रहते हैं, मगर कुत्तों का बड़ा निरादर करते हैं। निश्चय ही गाय हमें दूध और गोबर प्रदान कर हमारा बड़ा कल्याण करती है और वह पशुओं में सर्वोच्च आदर की योग्य है, मगर कुत्ते ही गाय-भैंस-बैल के बाद हमारे सबसे हितकारी जीव हैं। सड़क के लावारिस कुत्तों का ख़याल रखना और उन्हें भी भोजन और जल प्रदान करते रहना बड़े पुण्य का कार्य है। भगवान ने इसलिए गाय और कुत्ते को समभाव से देखने को कहा है।
English
The truly enlightened recognize that the souls within are all equally divine manifestations of God, and at their core, they are all one and the same. The meaning of “Shvapāka” is explained in Manusmriti, a significant scripture in orthodox Hinduism, specifically in verses 10:12, 10:16, and 10:19. In orthodox Hinduism, the Brāhmin class is considered the highest in the social hierarchy, while the Shvapāka is regarded as the lowest. Shvapāka is highly marginalized and despised, especially by the higher social classes, particularly the Brāhmins, who claim superior scriptural and spiritual knowledge and wisdom. This verse in the Bhagavad-Gitā (5:18) criticizes those who hold contemptuous attitudes toward the lower strata, including the Shudras (manual and menial workers), many of whom were designated as “untouchables.” The verse challenges the prevailing hierarchical social structure of orthodox Hinduism, known as Varnāshrama Dharma, which is founded on the concept of varnas (four social-occupational classes based on descent or parentage) and āshramas (four stages of life). This hierarchical order historically hindered social mobility, especially for those in lower strata, and fostered a sense of disdain for them. The Bhagavad-Gitā, through verses like this one, represents a departure from traditional Hinduism toward a more enlightened and egalitarian belief system—the Bhagavad-Dharma. This Faith does not endorse a hierarchical social order based on birth and does not promote contempt for the Shudras. Furthermore, the Bhagavad-Gitā encourages a more inclusive view of spirituality by suggesting that God’s presence is equal in both the cow and the dog. This challenges the common trend in mainstream Hinduism, which venerates the cow but often disdains the dog.