4:36श्रीभगवानुवाच

Jnana Karma Sannyasa Yoga

ज्ञान कर्म संन्यास योग

Sanskrit Shloka

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥ 4:36॥

Padacheeda (Word-by-Word)

अपि चेत् असि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पाप-कृत्-तमः, सर्वम् ज्ञान-प्लवेन एव वृजिनम् सम्-तरिष्यसि।

Anvaya (Construction)

चेत् (यदि) सर्वेभ्यः (सभी) पापेभ्यः (पापियों से) अपि (भी) पाप-कृत्-तमः (बड़ा पाप करने वाला) असि (हो) ज्ञान-प्लवेन (ज्ञानरूपी नौका से) एव (ही) सर्वम् (संपूर्ण) वृजिनम् (पापों से) सम्-तरिष्यसि (पार कर जाओगे)।

Meaning

Hindi

यदि तुम अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी तुम {अध्यात्म-} ज्ञान-रूप नौका द्वारा निःसन्देह पाप-समुद्र को पार कर जाओगे।


English

Even if you have been the most sinful of all sinners, you will cross over {the river of} all sins by the boat of spiritual insight. (4:36)

Commentary

Hindi

महर्षि वाल्मीकि इसके उदाहरण हैं। 'पाप' शब्द इससे पहले भी कई श्लोकों में आ चुका है और बाद के कई श्लोकों में आने वाला है। यह जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है, जिस पर थोड़ी रोशनी डालना जरूरी है। भगवद् गीता में भगवान ने थोड़े-से ही पापों का उल्लेख किया है, विशेष रूप से सोलहवें अध्याय में। वहाँ हत्या और "अन्यायपूर्वक धन कमाने" को उन्होंने पापकर्म माना है। किंतु गीता में भगवान ने अधिकतर उन भावनाओं का उल्लेख किया है, जिनसे पापकर्मों की सृष्टि होती है। किंतु महाभारत में 'अनुशासन पर्व' के अंतर्गत 'दानधर्म पर्व' के पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः में पापों या दुष्कृतों के विषय में थोड़े विस्तार से चर्चा है। अन्य कई शास्त्रों में भी यह विषय विस्तार से वर्णित हुआ है। यहाँ महाभारत के उक्त खंड से, जहाँ पाप को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है, कुछ अंश दिए जाते हैं— वाणी के पाप: झूठ बोलना, कठोर वचन बोलना, असंबद्ध बकवाद करना और दूसरों की निंदा करना वाणी के पाप हैं। मन के पाप: अभिद्रोह, असूया, पराए धन की अभिलाषा, धर्म कार्यों में अश्रद्धा और पापकर्म के प्रति उत्साह का बढ़ना—ये मानसिक पाप कहे जाते हैं। शरीर के पाप: अगम्य स्त्री (माँ-बहन) के साथ समागम, पराई स्त्री का सेवन, प्राणियों का वध, नाना प्रकार के क्लेशों द्वारा दूसरे प्राणियों को सताना, पराए धन की चोरी, अपहरण अथवा नाश, अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण, दुर्व्यसन, दर्प या उद्दंडता से दूसरों को सताना, पापियों के संपर्क में रहकर दुराचार करना, पापकर्म में सहायता करना, अपयश बढ़ाने वाले कार्यों को करना—ये शारीरिक पापकर्म कहलाते हैं।