Jnana Karma Sannyasa Yoga
ज्ञान कर्म संन्यास योग
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥ 4:23॥
गत-सङ्गस्य मुक्तस्य, ज्ञान-अवस्थित-चेतसः, यज्ञाय आचरतः कर्म समग्रम् प्र-विलीयते।
गत-सङ्गस्य (जो आसक्ति से निवृत्त हो गया है) मुक्तस्य (जो मुक्त है) ज्ञान-अवस्थित-चेतसः (जिसकी चेतना ज्ञान में स्थिर हो गई है) यज्ञाय (जो यज्ञ के लिए) आचरतः (कर्म करता है) (उसके) समग्रम् (संपूर्ण) कर्म प्रविलीयते (कर्म विलीन हो जाते हैं)।
Hindi
जिसकी आसक्ति चली गई है, जिसकी चेतना निरंतर आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिर रहती है, जो केवल यज्ञ-संपादन के लिए आचरण करता है, ऐसे मुक्त मनुष्य के सारे कर्म पूर्णतः विलीन हो जाते हैं, अर्थात वे कर्म-बंधन {और कर्म-फल भोगने के लिए होने वाले पुनर्जन्म} की रचना नहीं करते।
English
All acts of a person dissolve into nothingness {leaving no kārmic trails that may cause reincarnation} whose attachment {to the worldly objects and affairs} has melted away, who experiences real freedom {due to disappearance of attachment}, whose mind is always stable in {spiritual} Knowledge, and all of whose acts are like a yajna (offerings to God). (4:23)
Hindi
‘यज्ञ’ शब्द से सामान्य जन प्रायः वही अर्थ ग्रहण करते हैं जिसे भगवान ने ‘द्रव्य-यज्ञ’ कहा है—अर्थात, जिसमें यज्ञ-वेदी सजाई जाती है, अग्नि प्रज्वलित की जाती है, और उसमें घी, चावल, तिल आदि द्रव्यों की आहुति दी जाती है। परंतु सभी कर्म क्या भला ऐसे यज्ञ के लिए किए जा सकते हैं? यज्ञ का गूढ़ आशय समझने के लिए विशेष रूप से आगे आने वाले निम्नलिखित श्लोकों को देखना चाहिए—गीता 4.24–28।