Karma Yoga
कर्म योग
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ 3:1॥
ज्यायसी चेत् कर्मणः ते मता बुद्धिः जनार्दन, तत् किम् कर्मणि घोरे माम् नि-योजयसि केशव।।
जनार्दन (हे कृष्ण)! चेत् (यदि) ते (आपको) कर्मणः (कर्म की अपेक्षा) बुद्धिः (ज्ञान) ज्यायसी (श्रेष्ठ) मता (मान्य है) तत् (तो) केशव (हे कृष्ण) माम् (मुझे) घोरे (भयानक) कर्मणि (कर्म में) किम् (क्यों) नियोजयसि (लगाते हैं)?
Hindi
हे श्रीकृष्ण! यदि आपको कर्म की अपेक्षा बुद्धि (ज्ञान) श्रेष्ठ मान्य है, तो फिर हे केशव! मुझे {युद्ध-जैसे} घोर कर्म में क्यों नियुक्त करते हैं?
English
O Janārdana! If you believe that the path of knowledge is superior to the path of action, why urge me to engage in the dreadful act of war, O Keshava? (3:1)
Hindi
भगवान ने दूसरे अध्याय के अंत में, यानी इस श्लोक के ठीक पहले, स्थितप्रज्ञता के संदर्भ में जो बातें कहीं, जैसे 'आत्मन्येवात्मना तुष्टः' अर्थात 'आत्मा से आत्मा में ही तुष्ट रहना' या 'या निशा सर्वभूतानां...' आदि, वे अर्जुन को परम ज्ञान की बातें लगीं। उसे लगा कि भला एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का युद्ध-जैसे घोर सांसारिक कर्मों से क्या लेना-देना! स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताने के पूर्व भगवान ने अर्जुन का परिचय कर्म-योग से कराया था और 'योगस्थः कुरु कर्माणि' आदि का संदेश दिया था। अर्जुन इन दो तरह की बातों में सामंजस्य नहीं बिठा पाने के कारण भ्रमित हो जाता है, जो अगले श्लोक में देखा जा सकता है। वह 'बुद्धि' या 'बुद्धियोग' का अर्थ भी ठीक से समझ नहीं पाया, ऐसा प्रतीत होता है।
English
Janārdana' is an epithet of Vishnu in the Puāanas. Sri Krishna is also called by this name. Janārdana means, “he who is the original abode and protector of all living beings.”