Moksha Sannyasa Yoga
मोक्ष संन्यास योग
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥ 18:19॥
ज्ञानम्, कर्म च, कर्ता च— त्रिधा एव गुण-भेदतः। प्र-उच्यते गुण-संङ्ख्याने यथा-वत् श्रृणु तानि अपि।
गुण-संङ्ख्याने (गुणों की संख्या के अनुसार) ज्ञानम् (ज्ञान) च (और) कर्म (कर्म) च (और) कर्ता (कर्ता) गुण-भेदतः (गुणों के भेद से) त्रिधा (तीन प्रकार से) एव (ही) प्र-उच्यते (कहा जाता है) तानि (उनका) अपि (भी) यथा-वत् (जैसा-वैसा) श्रृणु (सुनो)।
Hindi
हे अर्जुन! जैसे प्रकृति के तीन गुण होते हैं – सत्त्व, रजस् और तमस्, उसी प्रकार ज्ञान, कर्म और कर्ता भी इन गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के होते हैं। गुणों के विवेचन में जैसे इन्हें बताया गया है, अब मैं तुम्हें वही यथावत (वास्तविक रूप में) समझाने जा रहा हूँ, ध्यान से सुनो।।
English
According to the Sāmkhya doctrine, knowledge, action, and the doer are said to be of three kinds based on the distinction of the Modes of Nature. Listen to them as they are. (18:19)
Hindi
यहाँ 'गुण-सङ्ख्याने' शब्द पर थोड़ी टिप्पणी की आवश्यकता है। 'सङ्ख्या' शब्द बना है: सम् + ख्या (ख्या धातु) से, जहाँ 'ख्या' का अर्थ है — "कथन करना" या "बताना," जैसे 'आख्यान' शब्द में, जिसका अर्थ है "कहानी।" इस प्रकार, 'सङ्ख्या' का गहरा अर्थ केवल "गिनती" नहीं, बल्कि "वर्णन" या "विस्तार से समझाना" भी होता है। 'सङ्ख्या' और 'साङ्ख्य' शब्द एक जैसे दिखते हैं, लेकिन उनके अर्थ, उपयोग, और दार्शनिक महत्व अलग हैं — हालाँकि वे एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए भी हैं। सम् + ख्या (ख्या धातु) "बताना", "कहना", "वर्णन करना" को द्योतित करता है, जबकि एक मिलता-जुलता शब्द 'साङ्ख्य' की व्युत्पत्ति अलग प्रकार की है। यह शब्द साङ् और ख्या धातु के संयोग से बना है, जिसका अर्थ है "पूर्ण रूप से जानना" — अर्थात विवेकयुक्त ज्ञान, तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान। 'साङ्ख्य' भारतीय दर्शन की एक धारा भी है, जो यह मानता है कि संसार प्रकृति के तीन गुणों और पुरुष (चेतन आत्मा) से बना है। साङ्ख्य में २५ तत्त्वों की विवेचना भी है — महत्तत्त्व, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ आदि। इसलिए तीन गुणों की संख्या या विवेचना और व्याख्या का संबंध अक्सर साङ्ख्य दर्शन से भी जोड़ा जाता है। 'साङ्ख्य' दर्शन एक ज्ञानमार्ग है, जहाँ केवल ज्ञान से मुक्ति संभव मानी जाती है — कर्म और भक्ति नहीं।