Daivasura Sampad Vibhaga Yoga
दैवासुर सम्पद विभाग योग
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥ 16:8॥
अ-सत्यम् अ-प्रतिष्ठम् ते जगत् आहुः अन्-ईश्वरम्, अ-परस्पर-सम्भूतम् किम् अन्यत् काम-हैतुकम् ।।
ते (वे) आहुः (कहते हैं) —जगत् (यह संसार) असत्यम् (असत्य है), अप्रतिष्ठम् (जिसका कोई आधार नहीं है), अनीश्वरम् (जिसका कोई ईश्वर नहीं है); इदम् जगत् (यह संसार) अपरस्परसम्भूतम् (सिर्फ स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है), कामहैतुकम् (कामना ही इसका कारण है), किम् अन्यत् (भला और क्या कारण हो सकता है?)।
Hindi
वे {आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य} कहा करते हैं कि सारा जगत असत्य है, अ-प्रतिष्ठ अर्थात निराधार है, बिना ईश्वर का है, बिना कारण के अपने-आप उत्पन्न है, अतएव काम (रतिकर्म) को छोड़कर, अर्थात मनुष्य की विषय-वासना और भोग-विलास के अलावा संसार का क्या प्रयोजन हो सकता है?
English
They—those with a demonical disposition—assert that there is no enduring truth in the world, that the world lacks a foundational or sustaining force, that there is no God or Supreme Ruler, and that the origin of living beings is solely driven by sexual passion. According to them, apart from lust and indulgence, life holds no other purpose. (16:8)