Bhakti Yoga
भक्ति योग
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ 12:2॥
मयि आवेश्य मनः ये माम् नित्य-युक्ताः उपासते, श्रद्धया परया उपेताः, ते मे युक्त-तमाः मताः।।
मयि (मुझमें) मनः (मन) आवेश्य (अर्पित करके) नित्य-युक्ताः (सदैव जुड़े हुए) ये (जो) परया (अत्यधिक) श्रद्धया (श्रद्धा से) उपेताः (युक्त हैं), माम् (मुझ को) उपासते (भजते हैं), ते (वे) मे (मुझ को) युक्त-तमाः (सबसे श्रेष्ठ योगी) मताः (मान्य हैं)।
Hindi
जिनका मन मुझसे भावाविष्ट हो, जो निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगकर मुझसे जुड़े रहते हों, जो परम श्रद्धा-भावना से युक्त होकर मुझ {सगुण-रूप} परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।
English
Those who worship Me (the Personified God) with utmost love and reverence, with hearts brimming with devotion and minds ceaselessly immersed in thoughts of Me, are the most knowledgeable in the science of spirituality (Yoga). (12:2)