Vibhuti Yoga
विभूति योग
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।। 10:8।।
अहम् सर्वस्य प्रभवः, मत्तः सर्वम् प्र-वर्तते, इति मत्वा भजन्ते माम् बुधा भाव-समन्विताः।
अहम् (मैं) सर्वस्य (सबका) प्रभवः (उत्पत्ति का कारण), मत्तः (मुझसे) सर्वम् (सब कुछ) प्र-वर्तते (चलता है), इति (ऐसा) मत्वा (समझकर)भाव-समन्विताः (श्रद्धा और भक्ति से युक्त) बुधाः (बुद्धिमान जन) माम् (मुझे) भजन्ते (भजते हैं)।
Hindi
मैं परमेश्वर ही सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ, मुझसे ही संसार प्रवृत्त होता है, इस प्रकार समझकर विवेकीजन मुझ परमेश्वर को भावमग्न होकर भजते हैं।
English
Recognizing that the entire Creation stems from Me, with My power animating everything, the wise souls worship Me with profound devotion. (10:8)
Hindi
यह निर्देश सिर्फ भक्तिमार्गियों के लिए है, यह समझना गलत होगा। ध्यान-योगी योगानंदजी स्पष्ट लिखते हैं कि आप तीस साल भी ध्यान करते रहेंगे तो भी ईश्वर अपने-आप को आपके समक्ष ध्यान में कतरा-भर भी प्रकट नहीं करेंगे, यदि आपमें उनके साक्षात्कार की भावना उत्कट या प्रबल रूप से विद्यमान नहीं है। इसलिए किसी भी मार्ग या योग में आप हों, भाव-समन्वित होना जरूरी है। भक्तिमार्ग में तो भावना ही मुख्य संबल है, और सबसे अधिक जरूरी है! यद्यपि शरीर और मन की सारी अवस्थाएँ ('भाव'–10:5) प्रकृति के त्रिगुणात्मक जगत की घटनाएँ हैं और व्यावहारिक रूप से प्रकृति-जनित हैं, मगर उन सबके पीछे ईश्वर की शक्ति विद्यमान रहती है। प्रत्येक क्षण ईश्वर उनके पीछे आदि-कारक के रूप में वर्तमान रहते हैं। महान वैज्ञानिक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत और प्रकृति के सभी अन्य नियमों के संदर्भ में यही कहा था कि ये नियम इतने सटीक तरीके से हमेशा और हर जगह एक-जैसे काम कैसे करते हैं, यह बिना ईश्वर की उपस्थिति के समझना कठिन है! अगर प्रकृति को ही संसार की हर अवस्था का स्वतंत्र कारण मान लिया जाए तो जागतिक अवस्थाओं के लिए प्रकृति की ही पूजा पर्याप्त हो! इसीलिए, यह बताया कि ईश्वर को ही मूल कारक जानकर उन्हीं को भजना चाहिए। वे अनुकूल हों तो प्रकृति भी अनुकूल रहे! यहाँ इस सत्य का प्रतिपादन है कि ईश्वर सुदूर स्थित कोई जगत-बाह्य ("transcendent") सत्ता ही नहीं हैं, वे जगत-अंतर्भूत ("immanent") सत्ता भी हैं।
English
The Bhakti Yoga path, known as the Path of Loving Devotion, prominently emphasizes the intensity of feelings toward God. However, it would be inaccurate to assume that other spiritual paths or Yogas require no feelings or emotions toward Him. Saint Yogānanda, who followed the Path of Meditation, noted in his "Autobiography of a Yogi" that even during continuous meditation, catching a glimpse of God may remain elusive without a profound longing for God’s presence. Therefore, it can be said that feelings and emotions play a vital role in the advancement of all spiritual paths or Yogas, though they are the primary driving force in the Path of Loving Devotion.